इस दौर मे मर्द को मर्द की मर्दानी अच्छी नहीं लगती!
उस दौर मे नर को नर सी नारी अच्छी नहीं लगती!
हाँ हज़रत को अब कोई बात पुरानी अच्छी नहीं लगती!
ख़ुश रहते हैं वो बस अब साथ कन्याकुमारी के!
क्या उनको अपने जीवन की वो सौग़ात पुरानी अच्छी नहीं लगती!
लेखक- काशिफ़ अहमद"©
ये एक ऐसी शायरी है जो काशिफ़ अहमद द्वारा लिखी गई है बहुत सारी जगहें पर इसने अपना असर लोगों के दिल ओ दिमाग पर डाला है। इस शेर में शायर आज के और कल के दौर की बात कर रहा है।
ये आज का दौर है जहां हम कुछ औरतों वाली हरकतें करते हैं ये हरकतें हमारे हाओ भाओ से जाहिर हो जाती हैं ना सिर्फ हम अपने हाथ औरतों की तरह चला कर बात करते हैं बाल्की लिबाज भी औरतें जेसे पहचानते हैं। मर्द के अंदर एक बल (urged) होता है जो मर्दानियत उसको कुदरत से मिली है वो शायद आज के दौर उसको अच्छी नहीं लगती।
Introduction: यह शायरी आज के वक्त की बदलती सोच और रिश्तो की दूरी और लोगों में आए बदलाव को बहुत बारीकी से आसान अल्फाजों में बताती है और दुनिया को आईना भी दिखती है, इसमें कंपैरिजन इस दौर और उसे दूर का है पहले लोग कैसे थे और अब लोग कैसे हैं यह पूरी दुनिया के लिए एक मैसेज है इस लेख में शब्द इधर से उधर नहीं कर गए इसमें शेयर सवाल भी पूछ रहा है कहीं ना कहीं दर्द भी छुपा हुआ है और तंज़ भी।

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